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चनपटिया पशु अस्पताल पर उठे सवाल: डॉक्टर की अनुपस्थिति, दवा व्यवस्था और एम्बुलेंस सेवा को लेकर ग्रामीणों की शिकायत

न्यूज़ दर्शन विशेष रिपोर्ट | चनपटिया, पश्चिम चंपारण

चनपटिया प्रखंड स्थित पशु अस्पताल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। स्थानीय ग्रामीणों और पशुपालकों ने अस्पताल की कार्यशैली, डॉक्टर की उपलब्धता, दवा वितरण व्यवस्था और एम्बुलेंस सेवा को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। इन्हीं आरोपों की पड़ताल करने न्यूज़ दर्शन की टीम चनपटिया पशु अस्पताल पहुँची, जहाँ अस्पताल प्रभारी डॉ. डी.के. सिन्हा से सीधे बातचीत कर स्थिति को समझने की कोशिश की गई।

डॉक्टर के केबिन में नहीं रहने का आरोप

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल में आने पर अक्सर डॉक्टर अपने केबिन में मौजूद नहीं रहते हैं, जिससे पशुपालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

इस पर जवाब देते हुए डॉ. डी.के. सिन्हा ने कहा कि उनकी जिम्मेदारी केवल अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र में फील्ड विजिट, पशुओं का टीकाकरण, पंचायत स्तर पर बैठकें और विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन भी करना पड़ता है।

डॉ. सिन्हा ने कहा कि:

“पूरे क्षेत्र में लगातार वैक्सीनेशन और इलाज का काम चलता रहता है। चनपटिया के साथ-साथ कुमारबाग और लोहरिया जैसे क्षेत्रों में भी सेवाएं दी जाती हैं। लगभग 25 पंचायतों की जिम्मेदारी होने के कारण कई बार फील्ड में रहना पड़ता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि ब्लॉक और जिला स्तर की बैठकों में शामिल होने के कारण अस्पताल में हर समय उपस्थित रहना संभव नहीं हो पाता।

एम्बुलेंस सेवा 1988 पर सवाल

ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत पशु एम्बुलेंस सेवा 1988 हेल्पलाइन को लेकर रही। कई लोगों ने आरोप लगाया कि इस नंबर पर कॉल करने के बावजूद संपर्क नहीं हो पाता है।

इस मुद्दे पर डॉ. सिन्हा ने बताया कि यह सेवा एक निजी एजेंसी के माध्यम से संचालित होती है और इसका नियंत्रण स्थानीय स्तर पर नहीं बल्कि उच्च स्तर पर होता है।

उन्होंने कहा कि:

“1988 नंबर से जुड़ी समस्या की शिकायत पंचायत समिति और अन्य बैठकों में भी उठाई गई है। तकनीकी दिक्कतें स्थानीय स्तर पर नियंत्रित नहीं की जा सकतीं।”

दवा वितरण और जानकारी पर उठे सवाल

निरीक्षण के दौरान दवा वितरण व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। रिपोर्टिंग टीम द्वारा दावा किया गया कि बुखार की दवा मांगने पर दूसरी दवा दी गई और दवा देने वाले कर्मियों को उसके उपयोग की स्पष्ट जानकारी नहीं थी।

इस पर डॉ. सिन्हा ने सफाई देते हुए कहा कि संबंधित दवा भूख बढ़ाने वाली थी और इलाज पशु की स्थिति व लक्षणों के आधार पर किया जाता है।

हालांकि बातचीत के दौरान पत्रकार और अस्पताल कर्मियों के बीच इस मुद्दे पर बहस भी देखने को मिली। पत्रकारों का कहना था कि अस्पताल में उपलब्ध दवाओं की जानकारी स्टाफ और डॉक्टर दोनों को स्पष्ट रूप से होनी चाहिए।

अस्पताल में कार्यरत कर्मचारियों की भूमिका

रिपोर्टिंग के दौरान अस्पताल में मौजूद कुछ कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े हुए। इस पर डॉ. सिन्हा ने बताया कि कुछ लोग वैक्सीनेशन डेटा अपलोडिंग, तकनीकी कार्य और प्रशिक्षण प्रक्रिया से जुड़े हैं।

उन्होंने कहा कि अस्पताल में कुछ कर्मचारी संविदा या प्रशिक्षण व्यवस्था के अंतर्गत भी काम कर रहे हैं।

साफ-सफाई को लेकर विवाद

अस्पताल परिसर की साफ-सफाई को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए। पूर्व में अस्पताल के बेसिन और परिसर की गंदगी को लेकर वीडियो सामने आने का जिक्र किया गया।

डॉ. सिन्हा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अस्पताल में बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है और किसी व्यक्ति द्वारा गंदगी फैलाने को सीधे अस्पताल प्रशासन की लापरवाही नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने यह भी दावा किया कि संबंधित स्थान की मरम्मत और सफाई बाद में कराई गई थी।

ग्रामीणों की शिकायत बनाम प्रशासन का पक्ष

पूरी बातचीत के दौरान एक तरफ ग्रामीणों की शिकायतें सामने आईं, वहीं दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन ने सीमित संसाधन, कम स्टाफ और व्यापक क्षेत्रीय जिम्मेदारियों का हवाला दिया।

ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल में डॉक्टर की उपलब्धता, दवा व्यवस्था और सेवाओं में सुधार की आवश्यकता है। वहीं प्रशासन का दावा है कि उपलब्ध संसाधनों के भीतर बेहतर सेवा देने का प्रयास किया जा रहा है।

निष्कर्ष

चनपटिया पशु अस्पताल से जुड़ी यह स्थिति ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं और पशुपालन व्यवस्था में मौजूद चुनौतियों को उजागर करती है। सवाल यह है कि क्या पशुपालकों को समय पर और प्रभावी सेवाएं मिल पा रही हैं, या फिर व्यवस्थागत कमियां जमीनी स्तर पर समस्या बन रही हैं?

अब देखना होगा कि संबंधित विभाग और उच्च अधिकारी इन शिकायतों पर क्या कदम उठाते हैं।

रिपोर्ट: आर्या मिश्रा

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