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बिहार के बक्सर में 100 करोड़ का बना एक नया पुल ढह गया

जिस चीज़ को अब बिहार में चुनाव और गड्ढों के बाद सबसे भरोसेमंद परंपरा माना जाने लगा है, उसी कड़ी में एक और “आधुनिक विकास परियोजना” जनता के सही तरीके से इस्तेमाल करने से पहले ही ढह गई।
इस बार मामला बक्सर का है, जहाँ करीब ₹100 करोड़ की लागत से बना नया पुल उम्मीद से कहीं पहले गुरुत्वाकर्षण के सामने आत्मसमर्पण कर बैठा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल इतनी जल्दी गिर गया कि लोगों को उस पर ठीक से सेल्फी लेने तक का समय नहीं मिला।इंजीनियर इसे “स्ट्रक्चरल फेल्योर” कह सकते हैं, लेकिन जनता जानती है कि असली इंजीनियरिंग का कमाल तो यह है कि भ्रष्टाचार हर सरकार बदलने के बाद भी बिना एक भी दरार के मजबूती से खड़ा रहता है।

करदाताओं के पैसे से बना यह पुल मानो बिहार के मशहूर “इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर्मूला” पर ही तैयार किया गया था- पहले बड़ी परियोजना की घोषणा करो, फिर फीता काटो, फिर विकास के दावे करते हुए प्रेस रिलीज़ जारी करो, और आखिर में बारिश, हवा, या कभी-कभी सिर्फ अपने अस्तित्व के दबाव में ही ढांचे के गिरने का इंतज़ार करो।

सरकार इसे निश्चित रूप से “तकनीकी खराबी” बताएगी।लेकिन जनता पहले से जानती है कि ऐसे कई प्रोजेक्ट्स के पीछे असली तकनीकी प्रक्रिया क्या होती है।

कहीं ठेकेदार के दफ्तर, राजनीतिक आशीर्वाद और विभागीय मंजूरी के बीच, ₹100 करोड़ के बजट में असली पुल सबसे कम महत्वपूर्ण चीज़ बनकर रह जाता है।स्थानीय निवासियों का दावा है कि निर्माण की गुणवत्ता शुरू से ही संदिग्ध थी।
लेकिन जिन परियोजनाओं में ठेकेदार, नेता और बिचौलियों—सभी को अपना “हिस्सा” चाहिए होता है, वहाँ मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्मीद करना शायद बहुत बड़ी मांग है।आखिर अगर सीमेंट उतना मजबूत होता जितना इस परियोजना के पीछे का भ्रष्टाचार नेटवर्क, तो शायद पुल आज भी खड़ा होता।

विडंबना यह है कि सरकारें ऐसे प्रोजेक्ट्स को “विकास” और प्रगति के प्रतीक के रूप में बड़े गर्व से पेश करती हैं।विशाल बैनर, ड्रोन शॉट्स, भाषण और सोशल मीडिया पर हैशटैग्स की बाढ़ आ जाती है।
लेकिन असली तस्वीर पहली भारी बारिश के बाद सामने आती है—जब सड़कें घुल जाती हैं, पुल गिर जाते हैं और जवाबदेही जनता के पैसों से भी तेज़ी से गायब हो जाती है।विपक्षी नेता इसे बड़ा घोटाला बताते हुए सरकार पर हमला कर रहे हैं।वहीं सत्तापक्ष मौसम, तकनीकी समस्याओं और पिछली सरकारों को दोष देने में व्यस्त है—क्योंकि भारतीय राजनीति में अब गिरते हुए पुलों की भी राजनीतिक विचारधारा होती है।

लेकिन बिहार के आम लोगों के लिए यह अब कोई चौंकाने वाली बात नहीं रह गई है।पुल गिरते हैं, वादे गिरते हैं और जनता का भरोसा गिरता है—सिर्फ भ्रष्टाचार ही है जो पूरी मजबूती के साथ स्थिर खड़ा रहता है।अब बिहार को शायद फीता काटने वाले समारोहों से ज्यादा असली इंजीनियरिंग की जरूरत है।क्योंकि अगर ₹100 करोड़ के पुल भी टिक नहीं पा रहे, तो सवाल उठना लाज़िमी है-

क्या यह पुल परिवहन के लिए बनाया गया था, या सिर्फ कमीशन बाँटने के लिए?

Shreya Singh, Natonal News Desk, NewsDarshan

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