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बिहार मद्यनिषेध परीक्षा महा-संकट! 38 जिलों के छात्रों के साथ क्यों हुआ ऐसा खिलवाड़?

बिहार में आज 14 जून को आयोजित मदनिषेध सिपाही भर्ती परीक्षा ने एक बार फिर सूबे के परीक्षा मैनेजमेंट और रेलवे के बीच तालमेल की पोल खोलकर रख दी है। गहरी पड़ताल में यह बात सामने आई है कि केंद्रीय चयन पर्षद (CSBC) द्वारा आयोजित इस परीक्षा के लिए राज्य के सभी 38 जिलों से करीब लाखों उम्मीदवारों ने फॉर्म भरा था।

विडंबना यह रही कि दूर-दराज के जिलों जैसे कि पूर्णिया, किशनगंज, बांका या गोपालगंज के छात्रों के परीक्षा केंद्र उनके गृह जिलों से 200 से 300 किलोमीटर दूर पटना या उसके आस-पास के जिलों में डाल दिए गए।

बिहार में परिवहन का सबसे सुलभ और सस्ता साधन भारतीय रेलवे है, लेकिन जब 38 जिलों के छात्र एक साथ पटना के लिए निकले, तो पूर्व मध्य रेलवे (ECR) का पूरा सिस्टम चरमरा गया। रूट पर चलने वाली नियमित एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें अपने निर्धारित समय से 4 से 5 घंटे की देरी से चल रही थीं। आधी रात से ही स्टेशनों पर जो खौफनाक मंजर देखने को मिला, वह प्रशासन की आंखें खोलने के लिए काफी है; पैर रखने तक की जगह नहीं थी, स्टेशन का हर कोना खचाखच भरा था, और छात्र अपनी जान की परवाह किए बिना ट्रेन के इंजनों, छतों और बोगियों के गेट पर लटककर सफर करने को मजबूर थे।

इस प्रशासनिक नाकामी का सबसे बड़ा तकनीकी कारण यह रहा कि इतने बड़े राज्यव्यापी एग्जाम के बावजूद रेलवे और जिला प्रशासन के बीच कोई प्री-प्लानिंग या स्पेशल ट्रेनों का इंतजाम नहीं था। बोर्ड को अच्छी तरह पता था कि सुबह 8:00 बजे का रिपोर्टिंग टाइम है, जिसका मतलब है कि छात्र रात भर सफर करके ही सुबह केंद्र पर पहुंच पाएंगे; ऐसे में जो ट्रेनें रात को चलनी थीं, उन्हें प्राथमिकता देने के बजाय रेलवे के मिसमैनेजमेंट के कारण वे घंटों लेट हो गईं। नतीजा यह हुआ कि जो छात्र सुबह 5:00 बजे पटना जंक्शन पहुंचने वाले थे |

वे सुबह 9:00 या 10:00 बजे पहुंचे। परीक्षा केंद्रों के गेट पर जब इन रोते-बिलखते छात्रों को ‘नो एंट्री’ का बोर्ड दिखा, तो उनकी महीनों की मेहनत और उनके माता-पिता के गाढ़े पसीने की कमाई एक झटके में बर्बाद हो गई। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब सरकार को पता होता है कि परीक्षा में लाखों अभ्यर्थी शामिल होने वाले हैं, तो परिवहन विभाग और रेलवे मिलकर ‘एग्जाम स्पेशल’ बसें या ट्रेनें क्यों नहीं चलाते? यह सिर्फ एक परीक्षा का छूटना नहीं है, बल्कि बिहार के उन गरीब युवाओं के भविष्य की हत्या है जो सालों-साल एक सरकारी नौकरी की उम्मीद में रात-दिन एक करते हैं।

प्रशासन और रेलवे की इस घोर लापरवाही और लाखों छात्रों के भविष्य के साथ हुए इस भद्दे मज़ाक पर आपकी क्या राय है? क्या रेलवे और परीक्षा बोर्ड के बड़े अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए? हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर अपनी राय जरूर बताएं। बिहार के युवाओं की आवाज़ और ग्राउंड जीरो की ऐसी ही हर एक बड़ी और सच्ची खबर को बिना डरे, और ऐसी ही हर एक बड़ी ख़बर और विश्लेषण को देखने के लिए जुड़े रहिए न्यूज दर्शन (News Darsan) के साथ।

Saumya Pal
National Desk News Darshan

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