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बॉलीवुड में गूंजा “कइसे बनी गुलौरी बिना चटनी कईसे बनी”! जानिए इस गाने का असली इतिहास और रिलीज होने की पूरी टाइमलाइन

बॉलीवुड के बड़े मंच पर इस वक्त जिस भोजपुरी अंदाज़ का भौकाल देखने को मिल रहा है, उसकी जड़ें बेहद गहरी हैं। नीलकमल सिंह की आवाज़ में चर्चा में आया यह गाना—”कइसे बनी गुलौरी बिना चटनी कइसे बनी“—असल में कोई नया या हाल ही में लिखा गया गाना नहीं है। यह भोजपुरी लोक संगीत (Folk Music) का एक बेहद पारंपरिक, ऐतिहासिक और दशकों पुराना सदाबहार गीत है। मूल रूप से इस गाने का इतिहास साल 1980 और 1990 के दशक से जुड़ा हुआ है,

जब इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक उत्सवों और शादियों के दौरान लोक कलाकारों द्वारा गाया जाता था। जब भोजपुरी में कैसेट और एल्बम्स का दौर शुरू हुआ, तब टी-सीरीज जैसी बड़ी म्यूजिक कंपनियों ने इस पारंपरिक धुन को रिकॉर्ड करके बाजार में उतारा था, जिसके बाद से ही यह गाना हर भोजपुरी भाषी के दिल में बस गया।

अब बात करें इस गाने के आधुनिक दौर और मौजूदा टाइमलाइन की, तो इस पुराने कड़क ट्रैक को बिल्कुल नए म्यूजिक अरेंजमेंट, आधुनिक बीट्स और सिंकॉपेटेड रिदम के साथ पिछले साल (2025) के आखिरी महीनों से लेकर इस साल (2026) के शुरुआती हफ्तों के बीच री-रिकॉर्ड और रीमिक्स करके रिलीज किया गया है। जब इस नए वर्जन को बॉलीवुड प्रोजेक्ट्स और सोशल मीडिया के बड़े रील्स क्रिएटर्स ने लपका, तो यह देखते ही देखते इंटरनेट पर दोबारा ट्रेंडिंग चार्ट्स में टॉप पर आ गया।

पुरानी और मखमली लोक-संस्कृति को जब आज के आधुनिक रैप और क्लब बीट्स का साथ मिला, तो इसने न सिर्फ यूपी-बिहार बल्कि गैर-भोजपुरी भाषी लोगों को भी थिरकने पर मजबूर कर दिया है, जो यह साबित करता है कि मिट्टी से जुड़े इस गाने का जादू आज भी बरकरार है।

दशकों पुराने इस पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत के नए स्वैग में दोबारा लौटने और आज के डिजिटल दौर में इसके इस जबर्दस्त क्रेज पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि बॉलीवुड को हमारे ऐसे ही और भी पुराने लोकगीतों को बढ़ावा देना चाहिए? हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर अपनी राय जरूर बताएं। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के इतिहास से लेकर देश और राज्यों की हर बड़ी खबर को सबसे देखने के लिए जुड़े रहिए न्यूज दर्शन (News Darsan) के साथ।

Saumya Pal
National Desk News Darshan

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