नई दिल्ली | 1 जुलाई, 2026 : हूल दिवस के अवसर पर पूरे देश ने आदिवासी वीरों और शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इस दिन लोगों ने उनके साहस, बलिदान और अंग्रेजों के खिलाफ किए गए संघर्ष को याद किया। हूल दिवस हर साल 1855 के संथाल हूल (विद्रोह) की याद में मनाया जाता है। इसे भारत के आजादी के आंदोलन की शुरुआती और महत्वपूर्ण आदिवासी क्रांतियों में से एक माना जाता है।
30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के संथाल क्षेत्र में यह विद्रोह शुरू हुआ था। उस समय अंग्रेजी शासन, जमींदारों और महाजनों के अत्याचारों से परेशान हजारों संथाल आदिवासी एकजुट होकर उनके खिलाफ खड़े हुए। इस आंदोलन का नेतृत्व “सिद्धू मुर्मू” , “कान्हू मुर्मू” , “चाँद मुर्मू” और “भैरव मुर्मू” ने किया। उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
हालांकि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को बल प्रयोग कर दबा दिया, लेकिन संथाल वीरों का साहस और बलिदान आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इतिहास में संथाल हूल को अंग्रेजी शासन के खिलाफ हुए सबसे बड़े आदिवासी आंदोलनों में गिना जाता है।
हूल दिवस के मौके पर “झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा” समेत कई राज्यों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन और संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों ने भी संथाल विद्रोह और आदिवासी समाज के योगदान को याद किया।
इस अवसर पर कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने शहीद आदिवासी वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि इन वीरों का बलिदान देश के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा और आदिवासी समाज के सम्मान तथा विकास के लिए निरंतर काम किया जाएगा।
हूल दिवस हमें उन वीर आदिवासी सेनानियों के त्याग और संघर्ष की याद दिलाता है, जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका साहस और देशभक्ति आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
Mantasha neyaz
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