ग्रामीण इलाकों में जिसे हम साधारण बोलचाल में ‘गोबर गैस’ कहते हैं, वह असल में विज्ञान की दुनिया में ‘बायोगैस’ (Biogas) के नाम से जानी जाती है। आज के समय में यह तकनीक सिर्फ चूल्हा जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इससे खेतों में ट्रैक्टर भी दौड़ाए जा रहे हैं। यह डीजल का एक ऐसा सस्ता और प्रदूषण-मुक्त विकल्प है जो किसानों की खेती की लागत को आधा कर सकता है। आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि गोबर से गैस बनने का वैज्ञानिक गणित क्या है, इसमें कौन-सी गैसें निकलती हैं और इस गैस से भारी-भरकम ट्रैक्टर कैसे काम करता है।
फर्मेंटेशन (सड़न) से कैसे बनती है यह गैस?
गोबर गैस बनने की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक और वैज्ञानिक है, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘फर्मेंटेशन’ (Fermentation – किण्वन या सड़न) कहा जाता है।
- घोल तैयार करना: इसे बनाने के लिए सबसे पहले पशुओं के ताजे गोबर को पानी के साथ एक निश्चित मात्रा में मिलाकर एक गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है, जिसे ‘स्लरी’ कहते हैं।
- टैंक के अंदर का कमाल: इस घोल को जमीन के अंदर बने एक पक्के और पूरी तरह से हवाबंद (Air-tight) ‘डाइजेस्टर टैंक’ में डाला जाता है। इस टैंक में हवा या ऑक्सीजन बिल्कुल नहीं होती। ऑक्सीजन न होने के कारण वहां विशेष प्रकार के बैक्टीरिया (Methanogenic Bacteria) पैदा होते हैं, जो गोबर के इस घोल को धीरे-धीरे सड़ाने यानी फर्मेंटेशन करने लगते हैं।
- गैस का निकलना: इसी फर्मेंटेशन की प्रक्रिया के दौरान घोल में से बारीक और हल्की गैसें (Thin gases) बुलबुलों के रूप में निकलकर ऊपर लगे गुंबद में इकट्ठा होने लगती हैं।
गोबर गैस में कौन-कौन सी गैसें होती हैं?
जब टैंक के अंदर गोबर का फर्मेंटेशन होता है, तो उसमें से मुख्य रूप से तीन पतली और हल्की गैसें बाहर निकलती हैं:
1: मीथेन (Methane – CH_4): यह बायोगैस का सबसे मुख्य और जरूरी हिस्सा है, जिसकी मात्रा करीब 50% से 65% तक होती है। यह एक बहुत ही हल्की और बिना धुएं के नीली लौ के साथ जलने वाली गैस है। यही गैस असली ईंधन (Fuel) का काम करती है।
2: कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide – CO_2): फर्मेंटेशन के दौरान लगभग 30% से 45% तक कार्बन डाइऑक्साइड भी बनती है। यह गैस खुद तो नहीं जलती, लेकिन टैंक के अंदर का दबाव (Pressure) बनाए रखने में मदद करती है।
3: हाइड्रोजन सल्फाइड (Hydrogen Sulfide – E_2S): यह बहुत ही मामूली (1% से भी कम) मात्रा में बनती है, जिससे फर्मेंटेशन के दौरान एक हल्की सी तीखी गंध पैदा होती है।
इस गोबर गैस से ट्रैक्टर कैसे चलता है? जानिए पूरी तकनीक
साधारण गोबर गैस को सीधे ट्रैक्टर के इंजन में नहीं डाला जा सकता, क्योंकि उसमें मौजूद CO_2 और नमी इंजन को खराब कर सकते हैं। इसके लिए एक विशेष मैकेनिकल प्रोसेस अपनाया जाता है:
- गैस को ‘CBG’ में बदलना:
फर्मेंटेशन टैंक से निकली कच्ची गोबर गैस को विशेष फिल्टर मशीनों से गुजारा जाता है। वहां कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2), हाइड्रोजन सल्फाइड (E_2S) और पानी की नमी को पूरी तरह छानकर अलग कर दिया जाता है। इस सफाई के बाद जो गैस बचती है, उसमें 90% से ज्यादा शुद्ध ‘मीथेन’ (CH_4) होती है। इस शुद्ध गैस को हाई-प्रेशर कंप्रेसर मशीन से सिलेंडरों में भारी दबाव के साथ सीएनजी की तरह दबाकर भर दिया जाता है, जिसे CBG (Compressed Bio-Gas) कहते हैं। - ट्रैक्टर में गैस सिलेंडरों का फिट होना:
इस तैयार सीबीजी (CBG) गैस के भारी सिलेंडरों को ट्रैक्टर के चेसिस (फ्रेम) के ऊपर या डीजल टैंक की जगह सुरक्षित तरीके से फिट कर दिया जाता है। इन सिलेंडरों से हाई-प्रेशर पाइपलाइन सीधे ट्रैक्टर के इंजन तक जाती है, जिसमें गैस के बहाव को कंट्रोल करने के लिए ‘प्रेशर रेगुलेटर’ लगे होते हैं। - इंजन के अंदर का काम (Internal Combustion):
बायोगैस ट्रैक्टर के इंजन में ‘गैस injection सिस्टम’ और ‘स्पार्क प्लग’ तकनीक होती है। जब ट्रैक्टर स्टार्ट होता है, तो सिलेंडरों से शुद्ध मीथेन गैस इंजन के कंबशन चैंबर में पहुंचती है और बाहर से आने वाली हवा (Oxygen) के साथ मिक्स होती है। इसके बाद स्पार्क प्लग से एक छोटी सी चिंगारी निकलती है, जिससे यह मिश्रण जल उठता है। इस दहन (ब्लास्ट) से जो ताकत पैदा होती है, वह पिस्टन को तेजी से घुमाती है और ट्रैक्टर को खेतों में गहरी जुताई करने या भारी ट्रॉली खींचने के लिए कड़क पावर (Torque) मिल जाती है।
मुफ्त गैस के साथ ‘सुपर खाद’ का डबल फायदा
इस पूरे प्रोसेस की सबसे बड़ी खूबी यह है कि गैस बनने के बाद जो गोबर का सड़ा हुआ घोल (वेस्ट) बाहर निकलता है, वह खेतों के लिए सबसे बेहतरीन और शुद्ध जैविक खाद (Organic Fertilizer) बन जाता है। इसमें नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जिससे फसलों की पैदावार शानदार होती है। यानी किसानों को ट्रैक्टर चलाने और खाना पकाने के लिए मुफ्त ईंधन भी मिल जाता है और बाजार की महंगी रासायनिक खाद का पैसा भी पूरी तरह बच जाता है।
डीजल के बढ़ते दामों के बीच गोबर से गैस बनाकर ट्रैक्टर चलाने और मुफ्त खाद पाने की इस स्वदेशी तकनीक को आप किस तरह देखते हैं? क्या आने वाले समय में यह भारतीय खेती की तस्वीर बदल देगी? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमारे साथ ज़रूर साझा करें। कृषि, विज्ञान और ग्रामीण विकास से जुड़ी ऐसी ही हर एक कड़क और ज्ञानवर्धक जानकारी को सबसे पहले आसान भाषा में देखने के लिए जुड़े रहिए न्यूज़ दर्शन (News Darshan) साथ।
Saumya Pal
National Desk News Darshan




