महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर केंद्र की NDA सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक सहमति जुटाने की है। संसद के विशेष सत्र में सरकार ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण जल्द लागू करने और परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था, लेकिन विपक्ष के विरोध और पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो पाया। अब सवाल है कि NDA भविष्य में इस मुद्दे पर बहुमत कैसे जुटाएगा और क्या विपक्ष की आपत्तियों को दूर कर पाएगा?
क्या है पूरा मामला?
2023 में पारित 106वें संविधान संशोधन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। हालांकि इसका लागू होना अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ा हुआ है।
सरकार ने अप्रैल 2026 में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक लाकर महिलाओं के आरक्षण को 2029 के चुनाव से पहले लागू करने का रास्ता बनाने की कोशिश की।
NDA के सामने सबसे बड़ी चुनौती
संविधान संशोधन के लिए संसद में विशेष बहुमत चाहिए। यानी सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन आवश्यक होता है।
लोकसभा में NDA के पास साधारण बहुमत तो है, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए विपक्षी दलों का समर्थन भी जरूरी है। अप्रैल 2026 में हुए मतदान में सरकार को 298 वोट मिले जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। आवश्यक दो-तिहाई समर्थन नहीं मिलने से विधेयक गिर गया।
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?
विपक्ष का कहना है कि वह महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का विरोध कर रहा है। कांग्रेस, DMK समेत कई दलों का आरोप है कि सरकार ने दोनों मुद्दों को जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की।
दक्षिण भारत के कई दलों को आशंका है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घट सकती है, जबकि उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
दक्षिण बनाम उत्तर की चिंता
विभिन्न अध्ययनों और प्रस्तावित परिसीमन मॉडल के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों की सीटों में वृद्धि हो सकती है, जबकि तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों के प्रभाव को लेकर बहस चल रही है। यही वजह है कि दक्षिणी राज्यों के कई दल इस प्रस्ताव को लेकर सतर्क हैं।
हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा और सीटों की कुल संख्या बढ़ने से उनका हिस्सा भी बढ़ सकता है।
NDA बहुमत कैसे जुटा सकता है?
महिला आरक्षण और परिसीमन को अलग-अलग मुद्दों के रूप में पेश करना।
दक्षिणी राज्यों की चिंताओं पर स्पष्ट आश्वासन देना।
विपक्षी दलों के साथ सर्वदलीय सहमति बनाना।
राज्यों को प्रतिनिधित्व में नुकसान न होने का फार्मूला देना।
जनगणना और परिसीमन की समय-सीमा स्पष्ट करना।
राजनीतिक महत्व:-
महिला आरक्षण का मुद्दा देश की आधी आबादी से जुड़ा है, जबकि परिसीमन भविष्य की राजनीतिक शक्ति का निर्धारण करेगा। यही कारण है कि यह केवल विधायी नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक और संघीय मुद्दा बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापक सहमति के बिना इस तरह के संवैधानिक बदलावों को पारित कराना आसान नहीं होगा।
महिला आरक्षण पर लगभग सभी दल सिद्धांततः सहमत दिखते हैं, लेकिन परिसीमन को लेकर गहरे मतभेद बने हुए हैं। NDA के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह महिला सशक्तिकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए राज्यों की राजनीतिक आशंकाओं को भी दूर करे। जब तक व्यापक राजनीतिक सहमति नहीं बनती, तब तक महिला आरक्षण और परिसीमन का सवाल भारतीय राजनीति में बहस का बड़ा मुद्दा बना रहेगा।
Manvee singh
National desk, News darshan.




