National Desk / News Darshan: इकोसिस्टम क्राइसिस: नए पौधे लगाने से वापस नहीं आती बायोडायवर्सिटी, जानिए क्यों विनाश की कगार पर हैं देश के 4 बड़े ग्रीन हॉटस्पॉट्स
आज जब आप सुबह सोकर उठे होंगे, तो शायद सोशल मीडिया पर ‘World Environment Day’ के ढेरों कोट्स और नेताओं-अफसरों की पौधे लगाते हुए तस्वीरें आपकी टाइमलाइन पर तैर रही होंगी।
लेकिन इस दिखावे के शोर से दूर, जरा अपने कमरे की खिड़की खोलकर बाहर देखिए। क्या आपको महसूस हो रहा है कि हवा कितनी भारी और गर्म है? यह साल 2026 है। क्लाइमेट चेंज (Climate Change) अब कोई ऐसी चेतावनी नहीं है जो 2050 या 2100 के लिए दी जा रही थी।
यह संकट हमारे बेडरूम तक आ चुका है। भारत इस समय इतिहास के सबसे डरावने मौसमी बदलावों से गुजर रहा है। एक तरफ उत्तर भारत में पारा 48 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है, तो दूसरी तरफ हमारे जंगलों को ‘विकास’ की वेदी पर चुपचाप काटा जा रहा है।
आइए समझते हैं कि इस साल पर्यावरण के मोर्चे पर असलियत क्या है और कौन से नए आंकड़े आपको डराने वाले हैं।
दिन ही नहीं, अब ‘रातें’ भी हमें जला रही हैं।
अब तक हम और आप सिर्फ दोपहर की धूप और लू (Loo) से डरते थे लेकिन जून 2026 की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली वैज्ञानिक हकीकत यह है कि अब भारत की रातें भी उबल रही हैं।
मौसम विभाग (IMD) और हालिया क्लाइमेट रिपोर्ट्स (जैसे CEEW की स्टडी) के मुताबिक, भारत के 36 में से 35 राज्यों में रात का तापमान सामान्य से 3.1°C से 5°C तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा है दिल्ली जैसे शहरों में न्यूनतम (रात का) तापमान 35.2°C तक पहुंच गया है।
इसे विज्ञान की भाषा में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (Urban Heat Island) कहते हैं। दिनभर कंक्रीट की इमारतें और डामर की सड़कें धूप सोखती हैं और रात को जब इंसानी शरीर को रिकवर होना होता है, तब ये कंक्रीट आग उगलती है। नासा (NASA) के सैटेलाइट डेटा ने तो दिल्ली-एनसीआर की जमीनी सतह का तापमान (Surface Temperature) 60 डिग्री सेल्सियस तक रिकॉर्ड किया है। बिना एसी (AC) के अब नींद आना नामुमकिन हो चुका है और यह इस सदी का सबसे बड़ा हेल्थ क्राइसिस बनने जा रहा है।
विकास’ के नाम पर इस साल कहां-कहां चली कुल्हाड़ी?
हम हर साल 5 जून को एक पौधा लगाते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि हमारे सिस्टम ने हाल ही में कितने लाख पुराने, घने पेड़ काटने की मंजूरी दी है? सरकार के अपने आंकड़े और हालिया फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी (FAC) की मई 2026 की बैठक के मिनट्स कुछ और ही कहानी बयां करते हैं:
मई-जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, देश के विभिन्न मेगा प्रोजेक्ट्स के तहत लाखों पेड़ों की कटाई से पारिस्थितिकी को भारी नुकसान हो रहा है। ग्रेट निकोबार में 10 लाख और छत्तीसगढ़ के हसदेव में 5 लाख पेड़ों के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश की लोहित नदी और दिबांग घाटी में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के कारण हजारों हेक्टेयर जंगल और हज़ारों पेड़ नष्ट होने के कगार पर हैं। इन हॉटस्पॉट्स में चल रही विकास परियोजनाओं से स्थानीय जैव विविधता (Biodiversity) को अपूरणीय क्षति पहुँचने की संभावना है।
अकेले मई 2026 में केंद्र सरकार की FAC ने बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के नाम पर 3,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को डायवर्ट करने की मंजूरी दी है। विपक्ष का दावा है कि पिछले 11 वर्षों में देश में 1.6 करोड़ से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। कागज पर ‘कैम्पा’ (CAMPA) फंड के तहत दूसरे राज्यों (जैसे हरियाणा या एमपी) में इसके बदले नए पौधे लगाने का दावा किया जाता है। लेकिन क्या अंडमान के प्राचीन वर्षावनों या मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ के सदियों पुराने जंगलों की जगह ली गई घास या नए पौधे वो इकोसिस्टम वापस ला पाएंगे? जवाब है- कभी नहीं।
क्यों ‘कैम्पा’ (CAMPA) फंड इसका विकल्प नहीं है?
अक्सर सरकारें तर्क देती हैं कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उसके बदले दूसरी जगह पौधे लगा दिए जाएंगे (Compensatory Afforestation)।
लेकिन हमें यह समझना होगा: “आप एक 200 साल पुराने घने वर्षावन को काटकर, उसकी जगह किसी दूसरे राज्य में यूकेलिप्टस या सागौन के एक कतार में 10 लाख छोटे पौधे लगाकर ‘इकोसिस्टम’ वापस नहीं पा सकते। एक असली जंगल को बनने में सदियों का समय और हज़ारों जीवों का आपसी तालमेल लगता है। कंक्रीट के पौधों के पार्क कभी जंगल नहीं बन सकते।”
वेट-बल्ब टेम्परेचर’ का साइलेंट किलर: गर्मी अब सिर्फ थकाती नहीं, जान लेती है
2026 की इस हीटवेव में दुनिया के शीर्ष 100 सबसे गर्म शहरों में से 97 शहर भारतीय उपमहाद्वीप के थे। ओडिशा के बलांगीर और यूपी के बांदा में पारा 48.2°C तक गया। लेकिन इससे भी खतरनाक है ‘वेट-बल्ब टेम्परेचर’ (Wet-Bulb Temperature) का बढ़ना।
यह विज्ञान का वो नियम है जिसे अब आम जनता को समझना होगा। जब हवा में अत्यधिक गर्मी के साथ उमस (Humidity) मिल जाती है, तो हमारे शरीर का पसीना सूखना बंद हो जाता है। इंसानी शरीर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम फेल हो जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाए, तो स्वस्थ से स्वस्थ इंसान भी छांव में बैठने के बावजूद कुछ ही घंटों में दम तोड़ सकता है। भारत की औसत सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) पिछले कुछ सालों में 67% से बढ़कर 71.2% हो चुकी है, जो हमारी हीटवेव को जानलेवा बना रही है।
क्या है इसका समाधान?
ग्लोबल फॉरेस्ट गोल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, दुनिया भर में जंगलों को दोबारा लगाने की रफ्तार तय वादों से बहुत पीछे है। भारत हालांकि एफॉरेस्टेशन (वृक्षारोपण) के प्रयासों के कारण वैश्विक स्तर पर वन क्षेत्र में 9वें स्थान पर है, लेकिन यह नाकाफी है क्योंकि हमारा ग्रीन कवर अभी भी राष्ट्रीय लक्ष्य 33% से काफी नीचे (लगभग 22%) है।
अगर हम वाकई अपनी धरती को बचाना चाहते हैं, तो हमें इन 3 मोर्चों पर काम करना होगा:
‘सस्टेनेबल’ नहीं, ‘रेजिलिएंट’ इंफ्रास्ट्रक्चर: हमें ऐसी सड़कों और प्रोजेक्ट्स की जरूरत है जो जंगलों को बिना काटे टनल या वैकल्पिक रास्तों से गुजरें।
शहरी हरियाली (Trees Outside Forests): सिर्फ जंगलों के भरोसे न रहें। अपने घरों की छतों, सोसायटियों और सड़कों के किनारे मियांवाकी (Miyawaki) पद्धति से छोटे और घने जंगल उगाने होंगे ताकि शहरों का तापमान कम हो सके।
नेताओं से पर्यावरण पर जवाबदेही: जब तक पर्यावरण चुनाव का मुख्य मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक नीतियां सिर्फ फाइलों में रहेंगी।
आज पर्यावरण दिवस पर सोशल मीडिया पर फोटो डालने के बजाय, अपने घर के आसपास लगे किसी पुराने पेड़ को कटने से बचाइए। क्योंकि एक नया पौधा लगाने से बेहतर है, उस 50 साल पुराने पेड़ को जिंदा रखना जो आपको इस 48 डिग्री की भट्टी में मुफ्त की ऑक्सीजन और ठंडक दे रहा है।
(Writer: Riya Mishra)





