चीन की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है। देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर पिछले तीन वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। ताज़ा आर्थिक आंकड़ों ने चीन की धीमी पड़ती विकास रफ्तार को उजागर किया है, जिससे वैश्विक निवेशकों और अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की आर्थिक सुस्ती के पीछे कई कारण हैं। देश में घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है, लोग पहले की तुलना में कम खर्च कर रहे हैं और कंपनियां नए निवेश से बच रही हैं। इसके अलावा, रियल एस्टेट सेक्टर लंबे समय से संकट में है, जिससे निर्माण उद्योग और उससे जुड़े कारोबार प्रभावित हुए हैं। वहीं, वैश्विक बाजार में मांग कम होने के कारण चीन के निर्यात में भी गिरावट आई है, जिसका सीधा असर औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर पड़ा है।
इसके विपरीत, भारत लगातार दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाए हुए है। देश में मजबूत घरेलू बाजार, तेजी से बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, बढ़ता विदेशी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों ने आर्थिक विकास को नई गति दी है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जहां चीन आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, वहीं भारत लगातार सुधारों और निवेश के अनुकूल माहौल की बदौलत वैश्विक कंपनियों का भरोसा जीत रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन का विस्तार भारत में कर रही हैं, जिससे रोजगार और निवेश दोनों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था का असर वैश्विक व्यापार और निवेश पर भी पड़ सकता है। वहीं भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपनी तेज़ आर्थिक वृद्धि का लाभ उठाते हुए दुनिया के प्रमुख निवेश केंद्र के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करे।
अब चीन अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए नए प्रोत्साहन पैकेज और आर्थिक सुधारों पर काम कर रहा है। दूसरी ओर, भारत अपनी मजबूत विकास दर, बढ़ते निवेश और आर्थिक सुधारों के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगातार नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
Mantasha neyaz
National desk , news darshan




