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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं

नागरिकता और मतदान के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची यानी वोटर लिस्ट से हट जाता है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि उसकी भारतीय नागरिकता भी खत्म हो गई। कोर्ट ने कहा कि मतदान का अधिकार और नागरिकता, दोनों अलग-अलग कानूनी विषय हैं और केवल वोटर लिस्ट में नाम होने या न होने के आधार पर किसी की नागरिकता तय नहीं की जा सकती।

मतदाता सूची और नागरिकता से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ वोटर लिस्ट से किसी का नाम हट जाने को इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि वह अब भारतीय नागरिक नहीं है।अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का उद्देश्य केवल चुनाव कराना है और इसे नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सही है कि केवल भारतीय नागरिक ही मतदान कर सकते हैं, लेकिन इसका उल्टा हमेशा सही नहीं होता। किसी व्यक्ति का नाम प्रशासनिक गलती, पता बदलने, रिकॉर्ड में दोहराव या अन्य प्रक्रियात्मक कारणों से भी वोटर लिस्ट से हट सकता है।
ऐसी स्थिति में यह मान लेना कि उस व्यक्ति की नागरिकता खत्म हो गई है, कानूनन सही नहीं होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि भारत की नागरिकता का निर्धारण संविधान और नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार ही किया जाएगा।
किसी भी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठाने या उसे लेकर फैसला लेने से पहले कानून में निर्धारित पूरी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। केवल चुनावी रिकॉर्ड के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करती है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि मतदान का अधिकार और नागरिकता दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं।
यह टिप्पणी उन मामलों में भी अहम मानी जा रही है, जहां वोटर लिस्ट में संशोधन या नाम हटने के बाद किसी व्यक्ति की पहचान या नागरिकता पर सवाल खड़े किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को मतदाता सूची में संशोधन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वोटर लिस्ट नागरिकता तय करने का आधार नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है, तो उसके पास अपना नाम दोबारा जुड़वाने के लिए कानूनी उपाय मौजूद हैं और केवल नाम हटने से उसकी नागरिकता पर कोई असर नहीं पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर संविधान के उस मूल सिद्धांत को दोहराती है कि मतदाता सूची से नाम हटने का असर केवल मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है, नागरिकता पर नहीं। किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का फैसला केवल संविधान और कानून में तय प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है, ताकि हर नागरिक के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया की पूरी तरह रक्षा हो सके।

Shreya singh,
National desk,News darshan.

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