केंद्र सरकार की ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ योजना एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2029 तक लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है। हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान में बड़े बदलाव, राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति और चुनावी तैयारियों के विशाल ढांचे की जरूरत होगी। सरकार का कहना है कि इससे चुनावी खर्च कम होगा और शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी बनेगी, जबकि विपक्ष और कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर देश के संघीय ढांचे और राज्यों के मुद्दों पर पड़ सकता है।
क्या है ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’?
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मतलब है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर कराए जाएं, ताकि पूरे देश में एक साथ मतदान हो सके। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में भारत में यही व्यवस्था थी, लेकिन 1967 के बाद कई सरकारों के समय से पहले गिरने और विधानसभा तथा लोकसभा के समयपूर्व भंग होने के कारण चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे।
सरकार क्यों लाना चाहती है यह व्यवस्था?
सरकार का कहना है कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। हर चुनाव में सुरक्षा बलों की बड़ी तैनाती करनी पड़ती है और आचार संहिता लागू होने के कारण कई विकास परियोजनाएं और सरकारी फैसले प्रभावित होते हैं। सरकार का मानना है कि यदि चुनाव एक साथ होंगे तो प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, खर्च कम होगा और विकास कार्य बिना रुकावट जारी रह सकेंगे।
सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान के कई अनुच्छेदों और चुनाव संबंधी कानूनों में संशोधन करना होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी राज्य या केंद्र की सरकार अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले गिर जाती है, तो फिर क्या होगा? विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए निश्चित कार्यकाल (Fixed Term) या शेष अवधि के लिए चुनाव जैसे विकल्पों पर विचार करना होगा। इन सभी मुद्दों पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाना सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
पक्ष और विपक्ष की दलीलें
इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि इससे चुनावी खर्च में भारी कमी आएगी, प्रशासनिक व्यवस्था अधिक सुचारु होगी और सरकारें लगातार चुनावी मोड में रहने के बजाय विकास कार्यों पर अधिक ध्यान दे सकेंगी। वहीं, विरोध करने वालों का तर्क है कि एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय मुद्दे राज्यों के स्थानीय मुद्दों पर हावी हो सकते हैं। इससे क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंच सकता है और देश के संघीय ढांचे के संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
सरकार की नजर अब 2029 पर है, लेकिन इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए संविधान संशोधन, संसद की मंजूरी और राज्यों का सहयोग बेहद अहम होगा। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो यह भारत की लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में अब तक के सबसे बड़े और ऐतिहासिक सुधारों में से एक माना जाएगा।
Shreya singh,
National desk,News darshan.





