पटना, बिहार डेस्क: बिहार पुलिस महकमे के भीतर रसूख, पैरवी और जुगाड़ के दम पर मलाईदार जगहों या अपने मनपसंद जिलों में डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर जमे पुलिसकर्मियों के खिलाफ पुलिस मुख्यालय ने अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा हंटर चलाया है। एक बड़े प्रशासनिक फैसले के तहत, बिहार पुलिस मुख्यालय ने साल 2026 के अंतर्गत किए गए सभी अनाधिकृत और गैर-कानूनी डेपुटेशन आदेशों को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह रद्द कर दिया है। इसके साथ ही मुख्यालय ने एक सख्त गाइडलाइन जारी करते हुए ऐसे सभी पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को अविलंब अपने मूल पदस्थापना स्थल (जहां उनकी असली पोस्टिंग है) पर लौटने का कड़ा निर्देश दिया है। मुख्यालय के इस औचक फैसले से पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों उठाना पड़ा यह सख्त कदम?
बिहार पुलिस में लंबे समय से यह शिकायतें सामने आ रही थीं कि कई पुलिसकर्मी (सिपाही से लेकर सब-इंस्पेक्टर स्तर तक) अपने गृह जिलों के पास या शहरों में बने रहने के लिए अधिकारियों से सांठगांठ करके या राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर ‘डेपुटेशन’ करा लेते थे। नियमों के मुताबिक, डेपुटेशन एक विशेष और सीमित समय के लिए किसी खास कार्य (जैसे चुनाव, वीआईपी सुरक्षा या विशेष जांच) के लिए ही होना चाहिए। लेकिन धरातल पर कई कर्मी महीनों और सालों से अनाधिकृत रूप से इन जगहों पर जमे हुए थे, जिससे उन जिलों या थानों में पुलिस बल की भारी कमी हो रही थी जहां उनकी वास्तव में नियुक्ति थी। इसी विसंगति और प्रशासनिक ढीलेपन को पूरी तरह खत्म करने के लिए पुलिस मुख्यालय ने यह ‘क्लीन-अप ड्राइव’ (सफाई अभियान) चलाया है
आदेश की मुख्य बातें: क्या निर्देश दिए गए हैं?
पुलिस मुख्यालय ने इस आदेश को बेहद कड़ाई से लागू करने के लिए जिला कप्तानों (SSP/SP) और रेंज आईजी/डीआईजी को जिम्मेदारी सौंपी है। आदेश के तहत जो भी पुलिसकर्मी अनाधिकृत रूप से किसी अन्य विंग, जिला या कार्यालय में प्रतिनियुक्त हैं, उन्हें तुरंत वहां से विरमित (रिलीव) किया जाएगा ताकि वे अपने मूल वाहिनी या जिले में योगदान दे सकें। आदेश में यह भी साफ किया गया है कि यदि कोई कर्मी इस फैसले के बाद भी अपने मूल स्थान पर नहीं लौटता है, तो उसका मासिक वेतन तुरंत प्रभाव से रोक दिया जाएगा और इसे अनुशासनहीनता मानते हुए विभागीय कार्रवाई शुरू की जाएगी। इसके साथ ही, अब से किसी भी प्रकार के डेपुटेशन के लिए सीधे पुलिस मुख्यालय की पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर क्या पड़ेगा इसका असर?
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का मानना है कि मुख्यालय का यह फैसला बिहार की कानून-व्यवस्था को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में बहुत मददगार साबित होगा। वीआईपी ड्यूटी या मनपसंद दफ्तरों में बैठकर आराम फरमाने वाले पुलिसकर्मियों के वापस थानों और फील्ड में लौटने से थानों में मैनपावर (पुलिस बल) की कमी दूर होगी। इससे पेंडिंग मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और अपराध नियंत्रण के लिए गश्त (पेट्रोलिंग) व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकता है। यह फैसला यह भी साफ संदेश देता है कि पुलिस महकमे में अब किसी भी तरह की पैरवी या अनाधिकृत जुगाड़बाजी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
रसूख के दम पर मलाईदार जगहों पर जमे पुलिसकर्मियों के खिलाफ बिहार पुलिस मुख्यालय के इस कड़े एक्शन को आप किस तरह देखते हैं? क्या आपको लगता है कि इस फैसले से थानों की कार्यप्रणाली और आम जनता की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमारे साथ ज़रूर साझा करें। बिहार की राजनीति, प्रशासन और हर एक कड़क व सच्ची खबर को सबसे पहले आसान भाषा में देखने के लिए जुड़े रहिए हमारे साथ।
आदित्य ठाकुर
बिहार ब्यूरो, न्यूज़ दर्शन (News Darshan)





